236. त्यागी
Jul 24, 2026 ·
3m 49s
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Description
श्रीकृष्ण त्यागी को परिभाषित करते हुए कहते हैं “जो लोग न तो अकुशल(अप्रिय या दुःख रूप) कर्म से बचते हैं और न ही कुशल (सुखद या कल्याणकारी) कर्म में आसक्त होते हैं, वे त्यागी हैं। सात्विक गुणों से संपन्न और मेधावी होने के कारण वे संशय रहित होते है” (18.10)।हम सभी कुशल कर्मों को करने के लिए प्रेरित होते हैं और अकुशल कर्मों से बचते हैं। हम ऐसे कर्म करते हैं जो स्वयं की, परिवार, संगठन या समाज की भलाई के लिए होते हैं। हालाँकि यह तर्कसंगत लगता है लेकिन यह कर्मों के अकुशल और कुशल के रूप में विभाजन का परिणाम है। त्यागी वह है जिसके लिए यह आंतरिक विभाजन खत्म हो जाता है। श्रीकृष्ण उन्हें मेधावी कहते हैं जो आंतरिक विभाजन को छोड़ देते हैं। जब विभाजन के अंत से एकता आती है तो उनके संदेह भी समाप्त हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, त्यागी न तो किसी कर्म से घृणा करता है और न ही उससे आसक्त होता है।श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “देहधारी जीवों के लिए पूर्ण रूप से कर्मों का परित्याग करना असम्भव है लेकिन जो कर्मफलों का परित्याग करते हैं, वे वास्तव में त्यागी कहलाते हैं (18.11)। कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों के कर्मों का तो अच्छा, बुरा और मिश्रित, ऐसे तीन प्रकार के फल मरने के पश्चात् अवश्य होते हैं; किंतु कर्मफल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों के कर्मों का फल न तो इस लोक में और न परलोक में भोगना पड़ता है” (18.12)।अस्तित्व का मूल सत्य यह है कि देहधारी प्राणी कर्मों का त्याग नहीं कर सकते क्योंकि हमारा अस्तित्व ही भोजन करने और श्वास लेने जैसी कई गतिविधियों पर निर्भर करता है। श्रीकृष्ण कर्मफल के त्याग का मार्ग बताते हैं और इस उपदेश को उन्होंने अनेक अवसरों पर दोहराया भी है। यदि कोई कर्मफल से अपने आप को नहीं अलग करता तो क्या होता है? श्रीकृष्ण कहते हैं फल की आकांक्षा रखने वालों को तीन प्रकार के कर्मफलप्राप्त होते हैं; किंतु त्यागी को नहीं। हमारा आसक्ति भाव ही किसी कर्मफल को सुखद या दुःखद बनाता है। त्यागी वह है जो इस आसक्ति को छोड़ देता है और द्वैतों से ऊपर उठकर द्वन्द्वातीत (जो द्वन्द्वों से परे हो गया है) बन जाता है।
Information
| Author | Siva Prasad |
| Organization | Siva Prasad |
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